देश में पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को वैज्ञानिक आधार देने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति सामने आई है। केंद्रीय आयुष मंत्रालय के अंतर्गत बीते कुछ वर्षों में आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सा विधाओं से जुड़े अनुसंधान एवं नवाचार में तेजी देखी गई है, जिसका सीधा असर पेटेंट आवेदनों की संख्या पर पड़ा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस क्षेत्र में दाखिल किए गए पेटेंट आवेदनों की संख्या में आठ गुना की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह वृद्धि देश में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक कसौटी पर परखने और उसे बौद्धिक संपदा अधिकार के दायरे में लाने की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाती है। पहले जहां आयुष से संबंधित शोध कार्य सीमित संस्थानों तक ही केंद्रित था, वहीं अब देशभर के विश्वविद्यालयों, अनुसंधान केंद्रों और निजी कंपनियों ने भी इस दिशा में सक्रिय रुचि दिखानी शुरू कर दी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, कोविड महामारी के बाद वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के प्रति लोगों का रुझान काफी बढ़ा है, जिसका सकारात्मक प्रभाव भारत में हो रहे शोध कार्यों पर भी पड़ा है। आयुष आधारित औषधियों, हर्बल उत्पादों और उपचार प्रक्रियाओं को लेकर नई खोजों को पेटेंट सुरक्षा दिलाने के प्रयास तेज हुए हैं, जिससे न केवल भारतीय परंपरागत ज्ञान का संरक्षण हो रहा है बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने में भी मदद मिल रही है।
सरकार की ओर से आयुष क्षेत्र में अनुसंधान को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष योजनाएं और वित्तीय सहायता कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं, जिनका उद्देश्य युवा वैज्ञानिकों और स्टार्टअप्स को इस क्षेत्र में नवाचार के लिए प्रेरित करना है। मंत्रालय का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह वृद्धि दर और तेज हो सकती है, क्योंकि देश में पारंपरिक चिकित्सा आधारित उत्पादों की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि पेटेंट आवेदनों में इस बढ़ोतरी से भारत को वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा बाजार में एक मजबूत स्थिति हासिल करने में सहायता मिलेगी, साथ ही इससे रोजगार के नए अवसर भी पैदा होने की संभावना है।
छवि: PIB
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