उपराष्ट्रपति ने देश के चाय उद्योग को समय की मांग के अनुरूप ढालने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि तकनीकी उन्नयन, वैज्ञानिक अनुसंधान और मजबूत ब्रांडिंग के बिना भारतीय चाय अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकती है। एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत सदियों से चाय उत्पादन में अग्रणी रहा है, लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में इस विरासत को बनाए रखने के लिए नए सिरे से प्रयास करने होंगे।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि चाय बागानों में आधुनिक कृषि तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाया जाना चाहिए ताकि उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार हो सके। उन्होंने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए वैज्ञानिक शोध को प्राथमिकता देने की बात कही, जिससे फसल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और किसानों को बेहतर आमदनी मिल सके।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय चाय को वैश्विक बाजार में पहचान दिलाने के लिए मजबूत ब्रांड तैयार करने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, केवल कच्चे उत्पाद के निर्यात से उतना लाभ नहीं मिलता, जितना अपने स्वयं के ब्रांड के तहत तैयार उत्पाद बेचने से मिल सकता है। इसके लिए उन्होंने पैकेजिंग, विपणन और गुणवत्ता मानकों में सुधार पर ध्यान देने की सलाह दी।
कार्यक्रम में उपस्थित चाय उद्योग से जुड़े प्रतिनिधियों और अधिकारियों को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सरकार, उद्योग और शोध संस्थानों के बीच बेहतर तालमेल से ही इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है। उन्होंने युवाओं को इस क्षेत्र में नवाचार और उद्यमिता के अवसर तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होंने चाय बागान श्रमिकों के कल्याण पर भी जोर दिया और कहा कि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। उपराष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि सामूहिक प्रयासों से भारतीय चाय उद्योग आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत स्थिति में होगा।
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