header

Delhi News

जंतर-मंतर से ‘छात्रों की गूंज’ तक: क्या बदल रहा है युवाओं का राजनीतिक मिजाज?

दिल्ली के जंतर-मंतर से उठी छात्रों और युवाओं की आवाज अब देश की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत देती दिखाई दे रही है। NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं की अनियमितता, बेरोजगारी और भविष्य को लेकर परेशान युवाओं का गुस्सा अब केवल परीक्षा केंद्रों और विश्वविद्यालय परिसरों तक सीमित नहीं रह गया है।

यह गुस्सा धीरे-धीरे राजनीतिक सवाल में बदल रहा है।
इस बदलते राजनीतिक माहौल में राहुल गांधी जिस तरह लगातार छात्रों और युवाओं के बीच दिखाई दे रहे हैं, वह अपने आप में बड़ा राजनीतिक संकेत है।

जंतर-मंतर से शुरू हुई आवाज
दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर युवाओं की आवाज का केंद्र बना। NEET और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों ने सड़क पर उतरकर सवाल उठाए।

इन युवाओं का सवाल सीधा था, अगर कोई विद्यार्थी वर्षों तक मेहनत करके परीक्षा देता है और पेपर लीक या व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण उसका भविष्य खतरे में पड़ जाता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?

यह केवल परीक्षा का सवाल नहीं है।
यह उस युवा पीढ़ी के भविष्य का सवाल है, जो अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा देती है। Gen-Z का यह असंतोष अब राजनीतिक दलों के लिए भी चुनौती बन गया है।

राहुल गांधी ने पकड़ी छात्रों की नब्ज
राहुल गांधी ने इस असंतोष को समझने की कोशिश की। उन्होंने छात्रों के बीच जाकर उनकी बातें सुनीं और परीक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी तथा युवाओं के भविष्य को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। कांग्रेस का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पुणे में राहुल गांधी के कार्यक्रम में जिस तरह युवाओं और छात्रों की भीड़ दिखाई दी, उसे महज एक राजनीतिक कार्यक्रम की सामान्य भीड़ कहकर खारिज करना आसान नहीं है।
आखिर हजारों युवा किसी नेता को सुनने क्यों पहुंच रहे हैं? क्योंकि उन्हें लगता है कि कोई उनकी बात सुन रहा है। यही राजनीतिक बदलाव की पहली सीढ़ी होती है।

‘छात्रों की गूंज’ केवल कार्यक्रम नहीं
पुणे का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राहुल गांधी ने वहां युवाओं से केवल भाषण नहीं दिया, बल्कि उनके साथ संवाद किया।
महिलाओं की शिक्षा, स्वतंत्रता, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था और सामाजिक दबाव जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई।
राहुल गांधी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि आज की महिला केवल बेटी, पत्नी या मां की भूमिका तक सीमित नहीं है। वह डॉक्टर, इंजीनियर, खिलाड़ी, उद्यमी, नेता और अपने फैसले लेने वाली स्वतंत्र नागरिक भी है।
यह संदेश विशेष रूप से उस Gen-Z के बीच महत्वपूर्ण है, जो अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर पहले की पीढ़ियों की तुलना में अधिक मुखर है।

प्रधानमंत्री आवास तक पहुंचा छात्रों का सवाल
राहुल गांधी ने छात्रों के मुद्दे को केवल मंचों तक सीमित नहीं रखा। वह प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने तक पहुंचे।
यह कदम प्रतीकात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण था। संदेश साफ था, छात्रों की समस्या केवल शिक्षा मंत्रालय या किसी परीक्षा एजेंसी की समस्या नहीं है। जब लाखों विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित होता है तो देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व को भी जवाब देना होगा। प्रधानमंत्री आवास के बाहर राहुल गांधी का धरना इसी राजनीतिक संदेश का हिस्सा था।

कांग्रेस का बदलता चेहरा
लंबे समय तक कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा कि वह युवाओं और जमीनी आंदोलनों से दूर होती जा रही है। लेकिन राहुल गांधी ने पिछले कुछ समय में इस धारणा को बदलने की कोशिश की है।
किसान, मजदूर, छात्र, बेरोजगार युवा, छोटे कारोबारी और सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच जाकर संवाद करने की उनकी शैली ने कांग्रेस को एक अलग राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की है।
राहुल गांधी की राजनीति का सबसे बड़ा बदलाव यही दिखाई देता है कि वह अब केवल संसद के भीतर सरकार पर हमला नहीं करते, बल्कि सड़क पर उतरकर भी सवाल उठाते हैं। और यही बात युवाओं के एक वर्ग को आकर्षित कर रही है। भीड़ क्या कह रही है? राजनीति में भीड़ हमेशा वोट नहीं होती, लेकिन भीड़ को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। जब किसी नेता के कार्यक्रम में लगातार युवा बड़ी संख्या में पहुंचने लगें, जब छात्र स्वयं उसके साथ संवाद करना चाहें और जब उसके कार्यक्रमों की चर्चा बढ़ने लगे तो इसे राजनीतिक माहौल में बदलाव का संकेत जरूर माना जाता है।

राहुल गांधी के कार्यक्रमों में दिखाई दे रही युवाओं की भीड़ इसी बदलाव की ओर इशारा कर रही है।
जंतर-मंतर पर सरकार के खिलाफ नाराजगी और उसके बाद राहुल गांधी के कार्यक्रमों में युवाओं की मौजूदगी के बीच एक राजनीतिक संबंध दिखाई देता है।

युवा अभी किसी पार्टी के स्थायी समर्थक नहीं हैं आज का Gen-Z पारंपरिक अर्थों में किसी राजनीतिक पार्टी का स्थायी मतदाता नहीं है। वह सवाल पूछता है। वह सरकार से भी सवाल करता है और विपक्ष से भी।

उसे रोजगार चाहिए। उसे निष्पक्ष परीक्षा चाहिए। उसे पेपर लीक से सुरक्षा चाहिए। उसे पारदर्शी भर्ती चाहिए। उसे बेहतर शिक्षा व्यवस्था चाहिए। और सबसे बढ़कर उसे यह भरोसा चाहिए कि उसकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी। अगर कांग्रेस इन सवालों का भरोसेमंद जवाब देने में सफल होती है तो युवाओं के बीच उसका आधार निश्चित रूप से मजबूत हो सकता है।

भाजपा के लिए भी चुनौती
युवाओं का यह बदलता रुझान भाजपा के लिए भी महत्वपूर्ण राजनीतिक चुनौती है। भाजपा ने पिछले वर्षों में राष्ट्रवाद, विकास और मजबूत नेतृत्व की राजनीति के जरिए युवाओं के बीच मजबूत आधार बनाया है।

लेकिन नई पीढ़ी के सवाल बदल रहे हैं। वह पूछ रही है—परीक्षा कब होगी? नौकरी कब मिलेगी? पेपर लीक क्यों होता है? भर्ती प्रक्रिया वर्षों तक क्यों लटकती है? और अगर परीक्षा में गड़बड़ी होती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती?

इन सवालों के जवाब किसी भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण होंगे। राहुल गांधी के लिए अवसर भी और परीक्षा भी राहुल गांधी के सामने आज एक बड़ा राजनीतिक अवसर है।

अगर वह छात्रों और युवाओं के इस असंतोष को लगातार आवाज देते हैं और इसके साथ रोजगार, शिक्षा और परीक्षा सुधार का ठोस वैकल्पिक मॉडल देश के सामने रखते हैं तो कांग्रेस के लिए राजनीतिक जमीन तेजी से बदल सकती है।

जंतर-मंतर से लेकर पुणे के ‘छात्रों की गूंज’ तक और प्रधानमंत्री आवास के बाहर धरने तक राहुल गांधी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह युवाओं के सवालों को सड़क से संसद तक ले जाने के लिए तैयार हैं।
यही कारण है कि उनके कार्यक्रमों में उमड़ती भीड़ को केवल भीड़ कहकर नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से बड़ी भूल होगी।

भीड़ एक संदेश देती है, और इस समय उस संदेश को पढ़ने की जरूरत है। संदेश साफ है—युवा अब केवल भाषण नहीं सुनना चाहता, वह जवाब चाहता है। और जो नेता उसकी आवाज बनेगा, आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति में उसकी भूमिका उतनी ही बड़ी होगी।क्या कांग्रेस के लिए यह वापसी की शुरुआत है? यह सवाल अब पूरी तरह काल्पनिक नहीं रह गया है।

कांग्रेस अभी सत्ता से दूर है, लेकिन विपक्ष के रूप में राहुल गांधी ने युवाओं के बीच जिस तरह लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, उससे यह जरूर लगता है कि कांग्रेस के लिए एक नया राजनीतिक स्पेस तैयार हो रहा है।
जंतर-मंतर पर युवाओं का आक्रोश, ‘छात्रों की गूंज’ में राहुल गांधी के साथ संवाद और उनके कार्यक्रमों में उमड़ती भीड़ इस बदलते माहौल की अलग-अलग तस्वीरें नहीं, बल्कि एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय दिखाई देते हैं।

कहानी अभी पूरी नहीं हुई है। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारतीय राजनीति में युवा मतदाता एक बार फिर निर्णायक भूमिका की ओर बढ़ रहा है और इस बार उसकी आवाज को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा।
लेखक: KD Siddiqui E-Mail: unitedindialive5@gmail.com


Discover more from

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

 "United India Live" एक प्रतिष्ठित हिंदी समाचार पोर्टल है, जो निष्पक्षता, सत्यता और निर्भीक पत्रकारिता के सिद्धांतों पर कार्य करता है। हमारा उद्देश्य है जनता तक सटीक, तटस्थ और प्रमाणिक समाचार पहुंचाना, वह भी बिना किसी पक्षपात और दबाव के।

Discover more from

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading