अमेरिकी संसद से पास हुए एक नए कानून ने राष्ट्रपति ट्रम्प को तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने का व्यापक अधिकार दे दिया है। यह कानून सीधे तौर पर भारत को निशाना बनाकर नहीं लाया गया, लेकिन इसके असर से नई दिल्ली को सबसे ज्यादा जूझना पड़ सकता है। ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी भारत की जरूरतों के लिहाज से यह विधेयक नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
खास बात यह है कि यह कानून दोनों प्रमुख अमेरिकी राजनीतिक दलों के समर्थन से कांग्रेस में पास हुआ है, जिसके चलते व्यापारिक रिश्तों को लेकर अनिश्चितता का माहौल बन गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के व्यापक अधिकार मिलने से राष्ट्रपति के पास किसी भी देश पर, खासकर उन देशों पर जो रूस से तेल खरीद रहे हैं, दबाव बनाने की पूरी छूट होगी।
भारत के लिए यह स्थिति खासतौर पर संवेदनशील है, क्योंकि अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत को विविध स्रोतों से तेल आयात करना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद भारत की ऊर्जा नीति का अहम हिस्सा बनी रही है। नए कानून के प्रभावी होने के बाद भारत को अपनी आयात रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार, इस कानून के दूरगामी परिणाम सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि इसका असर वैश्विक तेल कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर भी पड़ना तय है। अगर बड़े तेल खरीदार देशों पर टैरिफ की तलवार लटकती है, तो इससे आपूर्ति श्रृंखला में भी उतार-चढ़ाव आ सकता है, जिसका असर आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
नई दिल्ली की कूटनीतिक टीम इस पूरे मसले पर बारीकी से नजर रख रही है, ताकि आने वाले समय में अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को संतुलित रखा जा सके। साथ ही, भारत सरकार अपनी ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने के विकल्पों को भी सक्रियता से तलाश रही है, जिससे किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम हो और भविष्य में इस तरह के दबाव से बचा जा सके।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिकी प्रशासन इस अधिकार का इस्तेमाल किस हद तक और कब करेगा, लेकिन इतना तय है कि आने वाले महीनों में भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों की दिशा इस कानून के क्रियान्वयन पर काफी हद तक निर्भर करेगी।
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