संभल हिंसा मामला: मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द, यूपी सरकार पर ₹10 लाख की लागत- सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA), 1980 के तहत निवारक हिरासत को रद्द कर दिया है। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें अफरोज की हिरासत को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत भी लगाई है।
लाइव लॉ हिंदी न्यूज़ पोर्टल के अनुसार मामले की सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को निवारक हिरासत का आधार बनाने के लिए अकेले इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हिरासत का आदेश पारित करते समय संबंधित प्राधिकारी को मामले की अन्य परिस्थितियों और उपलब्ध सामग्री पर भी विचार करना जरूरी था।

फैसला सुनाते समय जस्टिस दत्ता ने कानून सहायक को किया याद
फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने उस कानून सहायक को श्रद्धांजलि दी, जिसकी 27 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले मृत्यु हो गई थी। जस्टिस दत्ता ने यह फैसला उनकी स्मृति को समर्पित किया।
2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है मामला
मुल्ला अफरोज पर नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर हुए सर्वे के बाद भड़की हिंसा में शामिल होने का आरोप है। हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। अफरोज को घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। अभियोजन पक्ष की ओर से उसके खिलाफ पुलिस हिरासत में दिए गए एक कथित कबूलनामे सहित अन्य सामग्री पर भरोसा किया गया था।
बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अफरोज को जमानत दे दी थी। इसके बावजूद 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत उसके खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
कथित कबूलनामे की कानूनी वैधता पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की ओर से दलील दी गई कि उसकी गिरफ्तारी और बाद की कार्रवाई में पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे पर भरोसा किया गया, जबकि ऐसे बयान की कानूनी स्वीकार्यता पर गंभीर सवाल हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि केवल कई आपराधिक मामलों का मौजूद होना अपने आप में निवारक हिरासत का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। इसके लिए उपलब्ध सामग्री के आधार पर हिरासत का आदेश पारित करने वाले अधिकारी की वास्तविक और सूचित व्यक्तिपरक संतुष्टि आवश्यक है।
8 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखते समय सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से यह सवाल उठाया था कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को NSA के तहत निवारक हिरासत के लिए आवश्यक व्यक्तिपरक संतुष्टि का आधार बनाया जा सकता है या नहीं।
पुलिस फायरिंग की जांच का मुद्दा भी उठा
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह आरोप भी उठाया गया कि हिंसा के दौरान पुलिस द्वारा कथित गोलीबारी की निष्पक्ष जांच नहीं हुई। इस संबंध में विरोध याचिका दाखिल करने की अनुमति दिए जाने की मांग भी की गई।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला NSA के तहत निवारक हिरासत की वैधता से संबंधित है। इसे मुल्ला अफरोज के खिलाफ संभल हिंसा से जुड़े अन्य आपराधिक आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।
यूपी सरकार ने हिरासत के आदेश का किया बचाव
उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि उपलब्ध सामग्री से यह आशंका सामने आती है कि अफरोज दोबारा हिंसा कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। सरकार की ओर से दलील दी गई कि ऐसी संभावना दिखाने वाली सामग्री निवारक हिरासत को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त हो सकती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने NSA के तहत हिरासत आदेश को रद्द कर दिया और उसे बरकरार रखने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को भी निरस्त कर दिया। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये की लागत लगाई।
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