कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा करते हुए मनुस्मृति का हवाला दिया। उन्होंने मनुस्मृति के एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें महिला को जीवन के अलग-अलग चरणों में पिता, पति और पुत्र के अधीन रहने की बात कही गई है।
राहुल गांधी ने इसे महिलाओं की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताते हुए कहा कि ऐसे विचारों पर शर्म आनी चाहिए। उनके इस बयान के बाद भारतीय जनता पार्टी ने उनकी आलोचना की और मनुस्मृति को लेकर उनके बयान पर सवाल उठाए।
राहुल गांधी ने क्या कहा?
राहुल गांधी ने कहा कि समाज में महिलाओं की पहचान अक्सर बेटी, पत्नी और मां तक सीमित कर दी जाती है। उनके मुताबिक महिला की पहचान इसके अलावा भी हो सकती है। वह प्रोफेशनल, खिलाड़ी, नेता, उद्यमी या किसी अन्य क्षेत्र में काम करने वाली स्वतंत्र व्यक्ति हो सकती है।
इसके बाद उन्होंने मनुस्मृति का उल्लेख करते हुए कहा कि बचपन में महिला को पिता, युवावस्था में पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्रों के अधीन रहने की बात कही गई है।
मनुस्मृति के श्लोक में वास्तव में क्या है?
जिस श्लोक का संदर्भ राहुल गांधी ने दिया, वह मनुस्मृति के अध्याय 5 के श्लोक 148 के रूप में उद्धृत किया जाता है।
इस श्लोक में कहा गया है कि महिला को बचपन में पिता, युवावस्था में पति और पति की मृत्यु के बाद पुत्रों के संरक्षण में रहना चाहिए तथा उसे स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।
यहां एक महत्वपूर्ण भाषाई अंतर है। संस्कृत के मूल शब्द ‘रक्षन्ति’ का अर्थ रक्षा करना या संरक्षण करना है, जबकि श्लोक के अंतिम हिस्से में ‘न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति’ आता है, जिसका सामान्य अर्थ है कि स्त्री स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं है।
इसलिए राहुल गांधी का यह कहना कि मनुस्मृति में महिला की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं किया गया है, श्लोक के अंतिम हिस्से के अर्थ से जुड़ा हुआ है। हालांकि, पूरे संदर्भ को समझने के लिए मूल संस्कृत पाठ और उसके अलग-अलग अनुवादों को देखना जरूरी है।
क्या मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में सिर्फ यही लिखा है?
नहीं। मनुस्मृति में महिलाओं के बारे में कई अलग-अलग तरह के कथन मिलते हैं। कुछ श्लोक महिलाओं के सम्मान और परिवार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हैं, जबकि कुछ श्लोक महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और उन्हें पुरुष संरक्षक के अधीन रखने की व्यवस्था प्रस्तुत करते हैं।
इसी वजह से मनुस्मृति में महिलाओं की स्थिति को केवल एक श्लोक के आधार पर समझना अधूरा होगा।
उदाहरण के लिए, मनुस्मृति के एक प्रसिद्ध श्लोक में कहा गया है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है, वहां देवताओं का वास माना जाता है। दूसरी ओर, अध्याय 5 के श्लोक 148 में महिला की स्वतंत्रता को लेकर स्पष्ट प्रतिबंधात्मक विचार व्यक्त किया गया है।
इतिहासकारों की व्याख्या क्यों अलग हो सकती है?
मनुस्मृति एक प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथ है और आधुनिक अर्थों में इसे भारत के संविधान या वर्तमान कानून की तरह नहीं पढ़ा जा सकता। इतिहासकार और संस्कृत के विद्वान इसके सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक संदर्भ की अलग-अलग व्याख्या करते रहे हैं।
कुछ विद्वानों के अनुसार मनुस्मृति में वर्णित नियम उस समय की सामाजिक व्यवस्था और पितृसत्तात्मक संरचना को दर्शाते हैं। वहीं, दूसरे विद्वान यह भी ध्यान दिलाते हैं कि ग्रंथ में महिलाओं को लेकर अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी विचार मौजूद हैं।
इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि मनुस्मृति के कुछ श्लोक महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं और उन्हें पुरुष संरक्षक के अधीन रखने की बात करते हैं, जबकि उसी ग्रंथ में महिलाओं के सम्मान और उनके महत्व को लेकर भी कथन मिलते हैं।
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