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Delhi Waqf Board Recruitment Scam: AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप तय

Delhi Waqf Board Recruitment Scam: नई दिल्ली। दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष अदालत ने आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक और दिल्ली वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन अमानतुल्लाह खान के खिलाफ भ्रष्टाचार के संगीन आरोप तय कर दिए हैं। यह मामला वक्फ बोर्ड में कथित अवैध नियुक्तियों से जुड़ा है, जिसकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) कर रही है। खान के अलावा इस मामले में दस अन्य व्यक्तियों को भी आरोपी बनाया गया है। अदालत ने कहा है कि इन सभी ने एक-दूसरे से मिलकर साजिश के तहत नियमों और सरकारी दिशा-निर्देशों को ताक पर रखकर भर्तियां कीं, जिससे न केवल सरकारी तंत्र की साख को आघात पहुंचा, बल्कि सरकार को लाखों रुपये का आर्थिक नुकसान भी हुआ।

अदालत की सख्त टिप्पणी: भाई-भतीजावाद भी भ्रष्टाचार

Delhi Waqf Board Recruitment Scam: विशेष न्यायाधीश दिग विनय सिंह ने आदेश पारित करते हुए कहा कि” अपने नजदीकी लोगों को लाभ पहुंचाना, यानी भाई-भतीजावाद, इस देश के प्रशासनिक ढांचे के लिए उतना ही हानिकारक है जितना कि खुला रिश्वतखोरी का मामला। यह भ्रष्टाचार की एक वैकल्पिक लेकिन घातक शैली है, जिससे जनता का विश्वास कमजोर होता है।”

उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस मामले में सामने आए तथ्यों से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि आरोपी व्यक्तियों ने आपसी साठगांठ से भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित किया और कानूनी प्रक्रिया को दरकिनार कर अपने मनपसंद लोगों को नियुक्त किया।

आरोपों का विवरण: गैरकानूनी भर्तियां, नियमों की अनदेखी

CBI की जांच में सामने आया कि जब अमानतुल्लाह खान दिल्ली वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष थे, उस दौरान उन्होंने बोर्ड में कई ऐसे लोगों की नियुक्तियां कराईं जो न तो चयन प्रक्रिया के योग्य थे और न ही उनकी भर्ती के लिए नियमानुसार प्रक्रिया अपनाई गई। इन भर्तियों में सरकारी नियमों, सेवा शर्तों और चयन प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।

CBI के अनुसार, इन अवैध नियुक्तियों के कारण सरकारी खजाने को ₹27,20,494 का सीधा नुकसान हुआ, जो इन कर्मचारियों को वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाओं के रूप में दिया गया।

IPC और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप

अदालत ने खान और अन्य आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120बी (आपराधिक साजिश) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) और 13(2) के तहत आरोप तय किए हैं। यह धाराएं सरकारी पद पर रहते हुए पद के दुरुपयोग और आपराधिक षड्यंत्र में भागीदारी से संबंधित हैं।

गिरफ्तारी नहीं, लेकिन आरोप गंभीर

दिलचस्प बात यह है कि मामले की जांच के दौरान CBI ने किसी भी आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया, लेकिन जांच रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया कि इन नियुक्तियों में जानबूझकर अनियमितता बरती गई, जिससे संदेह से परे साजिश की बू आती है।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि
“जब कोई नियुक्ति नियमों के खिलाफ की जाए, तो उसे केवल एक प्रशासनिक चूक या सेवा कानून का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। यह एक सुनियोजित प्रयास होता है, जिससे संस्थानों की साख गिरती है और आमजन में असंतोष फैलता है।”

अगली कार्यवाही की राह

अब इस मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होगी, जिसमें सभी आरोपियों को अपना बचाव पेश करने का अवसर मिलेगा। अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या वाकई आरोपियों ने साजिश के तहत नियमों की अनदेखी की और यदि हां, तो उन पर क्या सजा बनती है।

इस पूरे प्रकरण ने दिल्ली की राजनीति में हलचल मचा दी है। विपक्षी दलों ने आम आदमी पार्टी से इस मामले में सफाई की मांग की है, जबकि AAP की ओर से अब तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

यह मामला न केवल राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, बल्कि इससे सरकारी संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग को भी बल मिला है। अदालत की टिप्पणी कि ‘भाई-भतीजावाद भी भ्रष्टाचार का एक रूप है’, आने वाले समय में कई अन्य मामलों की जांच और न्यायिक दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकती है।


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