देश की सबसे दुर्लभ पक्षी प्रजातियों में शुमार Great Indian Bustard (GIB) के अस्तित्व को बचाने के लिए वन्यजीव विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों ने एक महत्वाकांक्षी पुनर्वास योजना की शुरुआत की है। गंभीर रूप से संकटग्रस्त इस प्रजाति की संख्या बीते कुछ दशकों में तेजी से घटी है, जिसके चलते इसे बचाने के लिए कैद में प्रजनन और प्राकृतिक आवास में छोड़े जाने की प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में स्वच्छंद विचरण करने वाला यह विशाल पक्षी आज मुश्किल से कुछ सौ की संख्या में ही शेष बचा है। राजस्थान का थार मरुस्थल इसका प्रमुख निवास स्थान माना जाता है, जहां अधिकांश शेष आबादी पाई जाती है। बिजली की हाई-टेंशन लाइनों से टकराना, आवास का सिकुड़ना और शिकार जैसे कारणों ने इस प्रजाति को विलुप्ति के कगार पर ला खड़ा किया है।
संरक्षण कार्यक्रम के तहत विशेष प्रजनन केंद्रों में अंडों से चूजों को निकालकर उनका लालन-पालन किया जाता है। एक बार जब ये पक्षी पर्याप्त रूप से परिपक्व हो जाते हैं, तब उन्हें नियंत्रित वातावरण में प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रशिक्षित करके धीरे-धीरे जंगल में स्वतंत्र किया जाता है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ‘री-वाइल्डिंग’ या पुनःप्रकृतिकरण कहा जाता है, जिसका उद्देश्य कृत्रिम रूप से पाले गए पक्षियों को स्वच्छंद जीवन जीने में सक्षम बनाना है।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह कदम केवल एक प्रजाति को बचाने भर का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने की दिशा में एक अहम पहल है। Great Indian Bustard को उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित करने के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जा रही है, ताकि मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्यूनतम किया जा सके।
इसके अलावा बिजली की लाइनों को भूमिगत करने और संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा घेरे बनाने जैसे उपायों पर भी काम चल रहा है, जिससे इन पक्षियों की दुर्घटनावश मृत्यु दर में कमी लाई जा सके। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि यदि यह संरक्षण मॉडल सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में Great Indian Bustard की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा सकती है, जो भारतीय वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा।
छवि: PIB
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