देश में दलहन फसलों की खेती को नई ऊंचाई देने के लिए केंद्र सरकार ने एक व्यापक अभियान की रूपरेखा तैयार की है, जिसका मकसद आयात पर निर्भरता घटाकर किसानों की आमदनी बढ़ाना है। कृषि मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, अरहर, चना, मसूर और उड़द जैसी प्रमुख दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बीज वितरण, तकनीकी सहायता और बेहतर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत को प्रतिवर्ष लाखों टन दालों का आयात करना पड़ता रहा है, जिसके चलते विदेशी मुद्रा का भारी व्यय होता है। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार ने किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज, सिंचाई सुविधाएं और फसल बीमा योजना का लाभ पहुंचाने की दिशा में काम तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बुवाई क्षेत्र में विस्तार के साथ-साथ उत्पादकता भी बढ़ाई जाए, तो आने वाले वर्षों में भारत दालों के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर बन सकता है।
राज्य सरकारों को भी इस राष्ट्रीय मिशन में सक्रिय भागीदार बनाया गया है। कई राज्यों में किसानों को दलहन की खेती के लिए प्रोत्साहन राशि दी जा रही है, वहीं कृषि वैज्ञानिकों की टीमें खेत-खेत जाकर नई तकनीकों की जानकारी दे रही हैं। सरकार का दावा है कि जैविक खाद के उपयोग और फसल चक्र परिवर्तन को बढ़ावा देने से न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।
किसान संगठनों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा है कि यदि समय पर खरीद और उचित मूल्य सुनिश्चित किया जाए तो किसान स्वेच्छा से दलहन की खेती की ओर रुख करेंगे। वहीं आर्थिक जानकारों का कहना है कि यह मिशन न केवल खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि देश के कृषि निर्यात को भी नई दिशा देगा। सरकार ने आगामी वर्षों के लिए उत्पादन लक्ष्य तय करते हुए इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में शामिल किया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आत्मनिर्भरता की यह यात्रा केवल सरकारी प्रयासों से पूरी नहीं होगी, बल्कि इसमें निजी क्षेत्र, कृषि अनुसंधान संस्थानों और किसानों की सामूहिक भागीदारी जरूरी है। आने वाले समय में इस मिशन के नतीजे देश की कृषि अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे।
छवि: EqualStock IN (Pexels)
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