भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े वैज्ञानिकों की एक टीम ने देश के भीतर ऐसे कुछ भू-भागों को चिन्हित किया है, जिनकी प्राकृतिक बनावट मंगल ग्रह की सतह से काफी मिलती-जुलती है। यह खोज भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO और संबंधित वैज्ञानिक संस्थानों के लिए आगामी ग्रहीय अभियानों की तैयारी में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।
शोध दल के अनुसार, लद्दाख क्षेत्र समेत देश के कुछ उच्च-ऊंचाई वाले शुष्क इलाकों में मिट्टी, चट्टानों और जलवायु परिस्थितियों में ऐसी विशेषताएं पाई गई हैं, जो मंगल ग्रह की भौगोलिक संरचना से काफी साम्यता रखती हैं। कम ऑक्सीजन, अत्यधिक ठंड और सूखी मिट्टी वाली यह जगहें वैज्ञानिकों को बिना अंतरिक्ष में गए मंगल जैसी परिस्थितियों में अध्ययन करने का अवसर प्रदान करती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इन स्थलों का इस्तेमाल भविष्य में मंगल मिशन से जुड़े उपकरणों, रोवर तकनीक और जीवन की संभावनाओं से जुड़े प्रयोगों के परीक्षण के लिए किया जा सकता है। इससे पहले कि असली मंगल अभियान भेजा जाए, धरती पर मौजूद इन ‘मार्स एनालॉग साइट्स’ पर तकनीकों को परखना वैज्ञानिकों के लिए कम खर्चीला और व्यावहारिक विकल्प है।
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि इन इलाकों की चट्टानों की रासायनिक बनावट और मिट्टी में मौजूद खनिज तत्व, नासा द्वारा मंगल पर भेजे गए रोवर्स से मिले आंकड़ों से काफी मेल खाते हैं। इस समानता को आधार बनाकर अब विस्तृत भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण किए जाने की योजना बनाई जा रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की खोज से भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान क्षमताओं को नई मजबूती मिलेगी और आने वाले समय में देश के ग्रहीय विज्ञान कार्यक्रमों को भी गति मिल सकती है। वैज्ञानिक समुदाय इसे भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देख रहा है।
छवि: PIB
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