New Delhi में हाल ही में संपन्न हुए BRICS सम्मेलन में सदस्य देशों ने आखिरकार एक साझा घोषणापत्र पर सहमति बनाने में सफलता तो पाई, मगर विशेषज्ञों का मानना है कि यह सहमति असल में गुटबंदी के भीतर बढ़ती दरारों को छिपाने में नाकाम रही।
RSIS (Rajaratnam School of International Studies) की विश्लेषक Nazia Hussain के अनुसार, समिट के बाद जारी संयुक्त घोषणापत्र की भाषा इतनी नरम और सतही रखी गई कि वह किसी वास्तविक समाधान का संकेत नहीं देती। उनके मुताबिक, यह दस्तावेज़ इस बात का प्रमाण है कि सदस्य देशों के बीच मतभेद सुलझे नहीं हैं, बल्कि जिस साझा जमीन पर सभी पक्ष एकमत हो सकते हैं, वह लगातार सिकुड़ती जा रही है।
विश्लेषकों का कहना है कि जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सदस्य देश किसी संवेदनशील मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं और उसकी जगह अस्पष्ट व सामान्य शब्दावली का सहारा लेते हैं, तो यह दरअसल गहरे मतभेदों को ढंकने की एक रणनीति बन जाती है। New Delhi में हुए इस सम्मेलन में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां तमाम बड़े मुद्दों पर स्पष्ट स्थिति लेने के बजाय कूटनीतिक रूप से संतुलित लेकिन कमजोर भाषा का इस्तेमाल किया गया।
Nazia Hussain बताती हैं कि इस तरह की भाषा दरअसल गुट की आंतरिक एकता की कमजोरी को उजागर करती है। जैसे-जैसे BRICS का विस्तार हो रहा है और नए सदस्य देश इसमें शामिल हो रहे हैं, वैसे-वैसे विभिन्न देशों के हितों और प्राथमिकताओं के बीच तालमेल बिठाना भी कठिन होता जा रहा है। परिणामस्वरूप, साझा सहमति के दायरे को इतना संकुचित करना पड़ रहा है कि वह ठोस नीतिगत बयानों की जगह केवल औपचारिक कूटनीतिक भाषा तक सीमित रह जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह प्रवृत्ति भविष्य में BRICS की प्रभावशीलता और वैश्विक मंच पर उसकी साख को प्रभावित कर सकती है। यदि सदस्य देश महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों पर एकजुट होकर ठोस रुख नहीं अपना पाते, तो यह गठबंधन एक प्रतीकात्मक मंच बनकर रह सकता है, जिसकी वास्तविक निर्णायक क्षमता सीमित होगी।
यह विश्लेषण इस बात को रेखांकित करता है कि New Delhi में हुई यह समिट भले ही सतह पर एकजुटता का प्रदर्शन प्रतीत हो, लेकिन गहराई से देखने पर यह गुट के भीतर बढ़ती जटिलताओं और विचारधारात्मक विविधता को भी सामने लाती है।
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